Fear


A million thoughts banging in my head
Trying to breakout the door
But I wont let them out
Just throw them back on floor…
Thousand waves crashing through
Pounding on the walls
Just dying to get seep away

If the words find them
It would be real
And all the judgment in the eyes..
I just dont wanna feel..

इबादत

ज़रा आँखे खोल के कर
इबादत ऐ दोस्त
रत्ती भर अंतर है
शैतान और भगवान में

तस्वीर

जब दिल भर आये
खुशियों से
आँसू उमड़ पड़े
आँखों से
जब नज़ारे इतने हो ख़ूबसूरत
की जी चाहे देखा करूँ इन्हें
जब हर लम्हा हो ऐसा
की बाहों में समेटने को जी करे
जो हर उम्मीद सहेज लेती है
हर भाव सजा के रख लेती है
हर कोने हर नुक्कड़ को
परख लेती है अपनी आँखों से
और संजो लेती है सबके लिए।
अब बस तस्वीर ही तो है।।

Fall

You will know
When the leaves turn into fire
And the clouds melt
The wind blows you away
And you can’t stop

Looking over the horizon

And admiring the colors

Trust me
You will know
That its fall

मेरे बाऊ जी

बचपन की थी आस
सुनती थी जब कहानियां सबकी
कि मेरे भी नाना दादा होते काश।।
जब मुझे देख
मिठी मुस्कान उनकी आती है
दिन भर की थकान मिट जाती है
ऐसे हैं मेरे बाऊ जी ।

लगता है कि अनमोल हूँ मैं
जब कहते हैं कि एक ही हूँ मैं
ऐसे हैं मेरे बाऊ जी ।

दिल भर आता है मेरा
जब पूछते हैं मुझसे
की कोई तकलीफ तो नहीं बिटिया
ऐसे हैं मेरे बाऊ जी ।

ममता और दुलार है अंतहीन जिसकी
सच्चाई भारी हर बात है
हर दिन कुछ नया सिखाये
ऐसे हैं मेरे बाऊ जी।

ये बात मुझे समझ नहीं आई

ये बात मुझे समझ नहीं आई
जिधर देखो चारों ओर
कैसी हो रही लड़ाई

बचपन से सीखा हमने
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाइ
आपस मे सब भाई भाई

एक साथ हुए बड़े
खेले एक ही आँगन में हम
साथ ही की हमने पढ़ाई

थक हार कर बैठे जब
जब भी भूख लगी हमे
सबकी माँ ने रोटी खिलाई

ये बात मुझे समझ न आई
कैसी हो रही लड़ाई
एक ही थाली में खाया खाना
ये याद तुझे कभी क्या याद ना आई?

इंसान हो सबसे पहले
क्यूँ नहीं होती तुमसे भलाई??

यही एक बात समझ नहीं आई
बहुत सोचा मैंने लेकिन
बस यही एक बात समझ नहीं आई।।

Scale

sometimes i wonder, what defines good and bad? I mean what the hell is good these days? Who is said to be good or bad?
Is the man bad if he stole food? if only to feed his child?
or is the man good if he donates to charity only to cut taxes and hide his illegally earned money?
what if a person hates everyone from the core of his heart but never acts on it, and on the front becomes the helper?
what if i a person doesn’t have bad intention for anyone but cant be polite?
who is to say which one is good?
who is true to there nature?
I mean human is bound to act against his instinct only if he is watched, he will act out if he knows there is not going to be any consequence.
So what is the scale of good and bad?
does Loyalty & honesty counts if its for the wrong reasons?
In todays world not a single person is said to be 100% good or bad.
the same person who cheats on you will give his everything to save another, the same who killed numerous cant see an animal hurt, what is that?
people say ignore small loss in order to gain big, but who is to decide that small doesn’t matter?
a poor steals bread he gets beaten to death , on the other hand rich steals millions and gets a deal from the government…
who is to decide which crime is bad?
I guess it all goes to power, if you have power you can be whatever you want, powerless is no one.
But then again, does being in power justifies your deeds?
there is no good or bad now, only levels, grades and amount…
The scale has been doomed…

सपनों का महल

भोर ढले निकलती हूँ
ढूंढ़ ढूंढ के चारो तरफ
बटोरती हूँ रोज़
टहनियों से मुंडेर बनाती हूँ

बैठ घुटनों पर
उन्हें चारों ओर बिछाती हूँ
नाज़ुक हाथों से
सहेजती  रेत
उनसे घर दीवार बनाती हूँ

बड़ी उम्मीदों से भरे
तर्जनी उंगली को घुमा
छोटे सुराख बनाती हूँ

काफ़ी मशक्कत से हर बार
सपनों के महल सजाती हूँ

फिर एक दिन
शाम ढले
बैठे उसे निहारती हूँ
देती हूँ छाँव उसको
बहती हवा से बचाती हूँ
दिल भर आता है और बस
पूरा ढेर अश्कों में मिटाती हूँ ।।

वो भी क्या दिन थे…

वो भी क्या दिन थे
शाम ढले गंगा किनारे
सूरज के साथ खेलते लुकाछुपी
सारे साथ खिलखिलाते थे।

जब नए साल पर घंटो बैठे
काग़ज़ रंगा करते थे
किसी का जन्म दिन हो अगर
बर्फी पे मोमबत्ती जला
खुशी मना लिया करते थे।

बस कलम से हाथ गंदे करते
जॉली मिलाया करते थे
कभी लगा ही नहीं
की कुछ कमी है बचपन में

वो भी क्या दिन थे
त्योहार को माँ
छोले भटूरे बनाती थी
और दोस्त इडली से बदलने आते थे।

वो भी क्या दिन थे
रेत के ढेर से शंख बटोर
पिट्ठू के लिए पत्थर कठोर
इक्की दुक्की के लिए समतल
ज़मीन ढूंड
हम यूँही खुश हो जाते थे।

वो भी क्या दिन थे
जब हम नज़रे चुराया करते थे
इधर उधर की खबर नहीं
कनखियों से पन्ने मिलाया करते थे।

घंटो लिखने की कोशिश करते
बस चिट्ठियाँ फाड़ा करते थे
काश की वो आये
ये सोच के कितने फोन किया करते थे
और पहली ही घंटी बजा
रिसीवर पटक भाग जाते थे।

वो भी क्या दिन थे
जब हम मासूम थे
कुछ भी नहीं था
पर हम खुश थे
जब हमारे हाथों में हाथ होते थे
4 इंच की स्क्रीन नही
जब बस्ते में किताबें थीं
कंप्यूटर नहीं

वो भी क्या दिन थे
जब हमारे दिलों में
हमदर्दी हुआ करती थी
प्यार अपनो के लिए तो
दया सबके लिए हुआ करती थी

सच…
वो भी क्या दिन थे।।